दो पल उस जमाने के


हिन्दी कविता दो पल उस जमाने के

हिन्दी कविता दो पल उस जमाने के

कागज वाली नाव मे सपने थे दूर जाने के
एक ये दौर है जो ढूंढता है बहाने
बचपन पास आने के
एक ये दौर है जो ढूंढता है
दो पल उस जमाने के

साइकिल के दो पहीयों पर
कितनी ही सवारी थी
शौर मचाते हम नहीं
वो हंसती सी यारी थी
आंखों में अरमान थे
सपनों का महल सजाने के
एक ये दौर है जो ढूंढता है
दो पल उस जमाने के Continue reading